परिचय

समय अपनी गति से निरंतर चलता रहता है। अपनी निरंतरता में वह समाज, संस्कृति, सभ्यता सबको प्रभावित करता चलता है। उसके प्रभाव से कोई नहीं बचता। वह बिना किसी आहट के दबे पाँव हमारे घरों में घुस जाता है और धीरे- धीरे हमारी सोच को प्रभावित कर देता है । चूँकि हमारा चिंतन काल सापेक्ष है अतः समय के साथ उसमें परिवर्तन स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसीलिए तो कहा गया है कि परिवर्तन संसार का नियम है। साहित्य जीवन, समाज तथा उसके उपादानों पर पड़ने वाले समय के उसी प्रभाव या परिवर्तन को पकड़ने तथा उसके निरंतर भागते क्षणों को स्थायी बनाने का माध्यम है। यों तो ज्ञान-विज्ञान के सारे साध्न और विषय समय के प्रभाव से जीवन और जगत में हुए परिवर्तनों के अन्वेषण तथा उसके अंकन का प्रयास करते हैं, परंतु काल के आयामों को जितनी सजीवता और सहजता से साहित्य पकड़ पाता है उतना और कोई विषय नहीं। यही कारण है कि साहित्य में निबद्ध जीवन सद्यःनवीन और सदैव प्राणवान होता है। जो स्रष्टा समय के इस परिवर्तन के सूक्ष्म से सूक्ष्म स्वरूप को जितनी सजगता और संजीदगी से रूपायित करता है वह उतना ही महान होता है। साहित्यकार समाज के केवल गोचर स्वरूप को ही नहीं, अपितु समाज की अंतःचेतना को भी आकार प्रदान करता है। वह साहित्य में सामाजिक यथार्थ का नवसृजन करता है। इस तरह साहित्य अपनी व्यापकता में संस्कृति, धर्म , दर्शन, इतिहास, भूगोल, राजनीति, अर्थशास्त्रा सबको समाहित करते हुए चलता है। जो साहित्य जितना समाज सापेक्ष होगा वह उतना ही सबल होगा। लेकिन समाज की अंतःचेतना को समझकर उसे युगानुरूप परिवर्तित परिवेश के अनुसार परिभाषित करना आसान नहीं होता। इसके लिए साहित्यकार को नई भाषा-भंगिमा तथा नए अर्थसंदर्भों की पड़ताल करनी पड़ती है। समय की सतत परिवर्तनशीलता के कारण साहित्यकार के सामने जीवन और जगत की सार्थकता की तलाश की समस्या सदैव बनी रहती है। यदि सृजनकर्ता अपने समय के जीवन और जगत को नई दृष्टि से नहीं देख पाता, उसे नया अर्थ नहीं प्रदान कर पाता तो उसका सृजनकर्म सार्थक नहीं हो पाता। रचना का अर्थ ही है-कुछ नया करना या बनाना। यदि वह पहले से दिए हुए अर्थ में नवीनता की तलाश नहीं करता है तो उसकी रचना नकल या अनुकरण बनकर रह जाती है। कालिदास से लेकर अज्ञेय तक में हम इसी नई अर्थवत्ता की तलाश देखते हैं। कालिदास ने ‘वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थ प्रतिपत्तये’ कहकर उसका संकेत दिया तो अज्ञेय ने ‘उपमान ये मैल हो गए हैं, देवता इन प्रतीकों के कर गए हैं कूच’ कहकर। सारांश यह कि हरेक रचनाकार के सामने जीवन और प्रकृति को नए रूप में प्रस्तुत करना उसकी मौलिक चुनौती है। यही चुनौती उसकी रचनात्मकता को अंजाम देती है और बल भी। ‘नई कविता’ के सूत्राधर कवि जगदीश गुप्त ने इस चुनौती को ‘कवि वही जो अकथनीय कहे’ कहकर सामने रखी है।

             साहित्य समय के साथ चलते हुए काल की गतिविध्यिों का लेखा-जोखा लेता चलता है। यह जीवन पर समय के पड़ने वाले प्रभावों का साक्षी होता है। जीवन के समानान्तर साहित्य की भी अपनी यात्रा अनवरत चलती रहती है। इसीलिए यह समय और जीवन दोनों का सहचर कहलाता है। इस संदर्भ में यदि पत्रिकाओं की बात की जाए तो वे ज्यादा समय सापेक्ष होती हैं और समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती हैं। इसमें तत्कालीन जीवन की गतिविध्यिों की जितनी सूक्ष्म पकड़ होती है उतनी अन्यत्रा नहीं, इसलिए यदि पत्रिकाओें को ‘समय का दस्तावेज’ कहा जाए तो अनुचित नहीं होगा। समय की उसी पगडंडी पर एक और नए यात्राी ने आरंभ करने की कोशिश की है-साहित्य यात्रा। हिन्दी की श्रीवृद्धि और पठन अभिरुचि के विकास में लघु पत्रिकाओं का योगदान अतुलनीय है। अक्षर की दुनिया का विस्तार तो जरूरी है। इसी जरूरत की पूर्ति में एक और अक्षर के योग के लघु प्रयास का नाम है ‘साहित्य यात्रा’।

पत्रा-पत्रिकाओं में रचनाएँ तो बहुत प्रकाशित होती रहती हैं पर उनमंे से अध्किांश काल के गाल में समा जाती हैं। सभी रचना कालजयी नहीं हो सकती। फर भी रचनाकर्म के श्रम की सराहना तो होनी ही चाहिए।

एक बात और, वो यह कि आज के साहित्य में शहर अध्कि घर कर गया है। लोग बेतहाशा शहर की ओर भाग रहे हैं। किसानी में अब पहले वाला आत्मसम्मान का भाव कहाँ? गाँव उजड़ रहे हैं। खेती की जमीन रोज-बरोज कम होती जा रही है। किसान के बच्चे अब मजूरी करने में शर्म नहीं महसूस करते। पर आज भी देश की सत्तर प्रतिशत आबादी गाँवों में ही निवास करती है। साहित्यकारों का यह दायित्व बनता है कि वे गाँव की समस्याओं को अपने साहित्य में जगह दें ताकि प्रेमचंद का संघर्ष खाली न जाए। ताकि अबकी बार गोबर जब शहर से गाँव आए तो उसे सारा गाँव अंधकार में नहीं दिखे, निराशा में डूबा नहीं दिखे, गाँव के लोग रोनी सूरत बनाए न दिखें, ऐसा न लगे कि उनके प्राणों की जगह वेदना ही बैठी है। गाँव के अंध्ेरे को साहित्य में रौशनी मिलनी चाहिए। आज के साहित्य को और अध्कि लोकोन्मुख होना होगा।

साहित्य यात्रा में ‘दस्तावेज’ नाम से एक स्थायी स्तंभ की शुरुआत की जा रही है। इस स्तंभ के अंतर्गत कीर्तिशेष पत्रिकाओं से कालजयी रचनाओं का पुनर्प्रकाशन किया जाएगा। मेरा उद्देश्य है कि आज की पीढ़ी उन रचना और रचनाकारों, उनके चिंतन-लेखन से रू-ब-रू हो सके।

डाॅ. कलानाथ मिश्र
संपादक